बुलंदशहर में मतदाता सूची पुनरीक्षण के आंकड़े चौंकाने वाले
यतिन कुमार शर्मा | बुलंदशहर 2 मिनट पहले
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में मतदाता सूची पुनरीक्षण (एसआईआर) के अंतिम दिन बेहद चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। इस प्रक्रिया के दौरान जनपद की सात विधानसभा सीटों पर पिछले मतदाता सूची की तुलना में लगभग 4 लाख 4 हजार मतदाता कम पाए गए हैं। यह स्थिति चुनावी परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि इससे आगामी चुनावों पर गहरा असर पड़ सकता है।
पुनरीक्षण से पहले और बाद के आंकड़े
सूची पुनरीक्षण से पहले बुलंदशहर जिले की सातों विधानसभा सीटों पर कुल 26 लाख 63 हजार 718 मतदाता थे। लेकिन पुनरीक्षण प्रक्रिया के बाद अब इन सीटों पर केवल 22 लाख 59 हजार 383 मतदाता दर्ज किए गए हैं। इनमें से अधिकांश मतदाता या तो स्थानांतरित हो गए हैं, मृत हैं, या उनके नाम डुप्लीकेट पाए गए हैं। इस प्रक्रिया में 93 प्रतिशत मैपिंग का कार्य पोर्टल पर अपलोड किया गया है, जिससे यह साफ़ होता है कि प्रशासन ने इस कार्य को तेजी से पूरा किया है।
सात विधानसभा सीटों पर मतदाता कमी
बुलंदशहर की सात विधानसभा सीटों पर हुई मतदाता कमी का विवरण इस प्रकार है:
- सिकंदराबाद: 65,000 मतदाता कम
- बुलंदशहर: 62,000 मतदाता कम
- स्याना: 43,000 मतदाता कम
- अनूपशहर: 61,000 मतदाता कम
- डिबाई: 54,000 मतदाता कम
- शिकारपुर: 47,000 मतदाता कम
- खुर्जा: 70,000 मतदाता कम
निर्वाचन अधिकारी का बयान
चुनाव निर्वाचन अधिकारी अभिषेक सिंह ने इस संबंध में जानकारी प्रदान करते हुए बताया कि यदि किसी मतदाता का नाम सूची में नहीं है या वह फॉर्म भरने से छूट गया है, तो वह फॉर्म-6 भरकर आवेदन कर सकता है। यह आवेदन उन्हें नाम जुड़वाने के लिए आवश्यक होगा। अधिकारी ने कहा कि इस बार की पुनरीक्षण प्रक्रिया में जो आंकड़े सामने आए हैं, वे संभावित रूप से चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं।
अभिषेक सिंह ने यह भी स्पष्ट किया कि सूची से हटाए गए अधिकांश मतदाता की स्थिति को ध्यान में रखते हुए ही यह प्रक्रिया की गई है। उन्होंने कहा कि यह जरूरी है कि लोगों को इस प्रक्रिया के बारे में जागरूक किया जाए ताकि वे समय पर अपने नाम जुड़वाने की कार्रवाई कर सकें।
आगामी चुनावों पर असर
बुलंदशहर जिले में मतदाता सूची के इस पुनरीक्षण का प्रभाव आगामी चुनावों पर विशेष रूप से देखने को मिलेगा। चुनाव में मतदान करने वाले मतदाताओं की संख्या कम होने से राजनीतिक दलों की रणनीति में बदलाव आ सकता है। इस स्थिति को देखते हुए सभी राजनीतिक दलों को अपनी चुनावी रणनीतियों पर पुनर्विचार करना होगा।
इस तरह के आंकड़े चुनावी माहौल को बदलने की क्षमता रखते हैं, और यह जरूरी है कि प्रशासन इस प्रक्रिया को पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ाए। इससे चुनावी प्रक्रिया में विश्वास बना रहेगा और मतदाता अपनी भागीदारी के लिए प्रेरित होंगे।
इस तरह की स्थिति से न केवल चुनावी प्रक्रिया प्रभावित होती है, बल्कि यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों पर भी सवाल उठाती है। इसलिए सभी नागरिकों को इस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए और अपनी जिम्मेदारियों को समझना चाहिए।






